Be yourself; Everyone else is already taken.
— Oscar Wilde.
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उसके इस फैसले में उसका बहुत कुछ सुरक्षित होने वाला था ।
और वह लड़का इस बात को अच्छी तरह से समझ रहा था ।
लेकिन कहीं ना कहीं इस सबके बीच काफी वक्त बीतता जा रहा था ।
आखिर ऐसा क्या होने वाला था जो उसे घर जाने की ओर इशारा कर रहा था ।
उस पेड़ के चारो तरफ वो कौन थे जो उस लड़के को इतना भयभीत करने में लगे थे खैर इन सबके बीच वो लड़का अब पूरी तरह से फस चुका था ।
और तमाम कोशिशों के बीच भी वो निकल नहीं पा रहा था ।
उस पेड़ में वो कौन था जिसके लिए इतने भयानक मौसम की जरूरत पड़ी क्या ये सब उस पेड़ के लिए था या कोई उस पेड़ के सहारे अपने आप को सुरक्षित करने का प्रयास कर रहा था । अब धीरे धीरे उस पेड़ की सारी पत्तियां बिल्कुल शांत हो चुकी थी ।
और जो भी डरावनी आवाजे चारो तरफ से आ रही थी उनका बढ़ना और तेज हो रहा था ।
अब शायद उस पेड़ को भी समझ आ रहा था कि कुछ बहुत बड़ा होने वाला है जिसे आज तक ना तो कभी सुना या देखा गया है ।
ऐसा इसलिए हो रहा था क्यूंकि अब तक उस पेड़ पे जो भी शक्ति इतने सालो से रह रही थी उसे शायद अब वहा से जाना जरूरी हो गया था ।
ये सब पूरी प्रक्रिया में उस पेड़ की बहुत ही बड़ी भूमिका मानी जा सकती है क्यूंकि आज तक उस पेड़ की मदद से ही वो शक्ति जो अब तक कितने लोगो को नुकसान पहुंचा चुकी थी ।
उसका अंत समय बहुत ही नजदीक था ।
ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्यूंकि अब तक इस तरह का दृश्य इस धरती पे किसी अदृश्य शक्ति को ले जाने के लिए कभी नहीं हुआ था ।
आज उस शक्ति को भी इस बात का अहसास हो रहा था कि शायद अब यहां ज्यादा समय तक रह पना संभव नहीं है इसलिए अब वो शक्ति भी पूरी तरह से अपने को बचाने का प्रयास बंद कर चुकी थी
और जो भी बदलो के रूप में उस अपने साथ ले जाने के लिए आए थे वो भी अपनी भाषा में बार बार उसे सीधे तरीके से यही समझने का प्रयास कर रहे थे कि अब तुम्हारा समय पूरा हो चुका है ।अब तुम यहां नहीं रह सकते हो ।
इस समय उस लड़के की हालत बिल्कुल ऐसी थी जैसे मानो कोई चाह कर भी अपने को बचा ना पाए ।
उसे अब किसी भी हाल में अपने घर जाना था ।
दूसरी तरफ वो काले बादल शायद अपने प्रयास में कामयाब हो चुके थे ।
और वो अदृश्य शक्ति अब वहा से जाने को भी तैयार हो गई थी ।
ये सब क्यूं हो रहा था इसको अभी कह पाना थोड़ा जल्दबाजी होगी ।
लेकिन एक बात जो उस पेड़ के बारे में कहीं जाती है कि कई इस तरह की घटनाएं बहुत ही अजीबो तरीके से उस पेड़ के आस पास घटती रहती थी जिसका उस जगह के आस पास के लोगों को आश्चरयचकित करती रहती थी ।
ऐसा कई बार प्रयास किया गया कि किसी तरह से इस पेड़ को काट दिया जाए लेकिन ये इतना आसान नहीं था जिसने भी कोशिश की सब आज तक अपने प्रयासों में असफल ही रहे ।
कहानी आगे जारी रहेगी………..
शाम का समय चारो तरफ एक अलग ही तरह का नजारा था।
ऐसा लग रहा था जैसे बादल बहुत ही ज्यादा गुस्से में है और वो अपना गुस्सा सबको दिखाना चाह रहे हो।
आपको यकीन हो ना हो लेकिन इस तरह के दृश्य को देखकर उस छोटे से लड़के को घर में रोक पाना मुश्किल होता था वो लड़का इस दृश्य को देखकर अपने आप को ना चाहते हुए भी रोक नहीं पाता था।
उस लड़के की उम्र लगभग उस समय ९साल की रही होगी ।
मानो जैसे आसमान में एक अलग तरह का युद्ध हो रहा हो और हर तरफ से एक दूसरे को डराने कि कोशिश की जा रही हो।कुछ बादल तो इतने ज्यादा गुस्से में थे कि उनके अनेकों रंग देखने को मिल रहे थे।
वो लड़का उस दिन भी इस मौसम का आंनद लेने के लिए घर से निकलने की तलाश में था ।उसे पता तो था की इस मौसम के कारण उसे निकलने नहीं दिया जाएगा और वो इस बात को समझ रहा था कि अगर मै किसी तरह से निकल भी गया ।
तो वापस घर आने पे मेरी खैर नहीं होगी।
धीरे-dheere बादलों का भी गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था।
चारो तरफ एक अलग ही तरह के रंग से आसमान घिरता चला जा रहा था।
लोग अपने अपने घरों को जल्दी पहुंचना चाह रहे थे।
और एक दूसरे को जल्द से जल्द कार्य पूरा करने को कह रहे थे।
कुछ लोग अपनो को फोन कर जल्दी घर आने की बात भी कह रहे थे।
इन सभी दृश्य को देखकर उस लड़के को बहुत ही विचित्र सा लग रहा था। उसे तो बस किसी भी हाल में घर से निकलना था।
इस बीच अंधेरे ने भी अपना रूप दिखाना शुरू कर दिया था।
कुछ लोग कुछ ज्यादा ही मौसम के बारे में अपनी अपनी बात कह रहे थे।
इन सबके बीच उस लड़के को आखिर घर से निकलने का मौका मिल ही गया। वो बेपरवाह,बेखौफ अपने ही धुन में मस्त लड़का घर से कुछ दूर जहा पूरी तरह से अकेले आसमान के उस दृश्य को ऐसे देख रहा था। जैसे उसे बादलों की भाषा समझ आ रही है कि बादल एक दूसरे को क्या कह रहे है।
उस लड़के के अंदर एक अलग ही प्रकार की जिज्ञासा थी क्या जानने की थी ये कहना जरा जल्दबाजी होगी।
सभी तरफ एक अलग ही तरह का सन्नाटा था वो बेखौफ लड़का धीरे धीरे आगे बढ़ता ही जा रहा था कुछ सी समय में कुछ खतरनाक तरह की आवाजें आनी शुरू हो गई।
ये शायद उपर आसमान से आ रही थी अचानक उस लड़के के चारो तरफ काले काले घने बादल छा गए ।
वो इस बात को वो खुद भी नहीं समझ पा रहा था कि ये सब हो क्या रहा है।अचानक उस लड़के की नजर एक ऐसे दृश्य पे पड़ी जिसकी सिर्फ कल्पना ही कि जा सकती है।
उस लड़के ने देखा कि वो घने काले बादल जो देखने में इंसान के आकार लेकिन इंसानों से कहीं ज्यादा बड़े।एक साथ इस आकार के कई आसमान से जमीन की तरफ आ रहे है।
और वो देखने में घने काले बादलों के कलर कि तरह दिख रहे थे।इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता कि उस लड़के को। किसी भी बात का जरा भी डर नहीं था कि अगले ही पल क्या हो सकता है।
हा मैंने आपको पहले ही बताया था कि ये एक बेखौफ, बेपरवाह तरह का लड़का था जिसे सही गलत की उतनी समझ अभी नहीं थी।धीरे धीरे वो आवाजे जो काफी देर से लोगो की कानों तक जा रही थी अब थोड़ा कम होना शुरू हो गई थी।वहीं इन सारे दृश्य को वो लड़का ऐसे देख रहा था। जैसे ये कोई खेल का हिस्सा सा हो कुछ देर में कुछ ही समय में ये सब एक खतरनाक , डरावना सा दृश्य बन चुका था ।जिसे वो हर एक इंसान देखना पसंद नहीं करेगा
अब चारो तरफ एक अजीब ही तरह का सन्नाटा छाया हुआ था जिसे देख कर एक सामान्य इंसान डर सकता है।कुछ ही समय में वो काले बदल जो इंसान के आकार से बहुत ही ज्यादा बड़े और देखने में डरावने दिख रहे थे।सब एक साथ एक पेड़ के आस पास घूमने लगे जो पेड़ भी देखने में कई वर्ष पुराना दिख रहा था ।
अब चारो तरफ की खामोशी उस लड़के को वहा से चले जाने का इशारा कर रही थी।उस लड़के को भी अब कुछ अजीब तरह के अकेलेपन का अहसास होने लगा था । कहीं न कही उसके दिमाग में कुछ घर कि तरफ चलने के खयाल आना शुरू हो गए थे वो लड़का डर रहा था कि नहीं ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन उसे ये जरूर पता चलने लगा था।
कि ये सब कुछ अलग ही हो रहा है।
अचानक से उस पेड़ से एक अजीब तरह की रोने की आवाज आना शुरू हो गई ।और वो कुछ इतना ज्यादा डरावना था जिसे शब्दो से बताया नहीं जा सकता कुछ ऐसा जैसे उस पेड़ के रूप में कोई और ही था जो अपने आप को बचाने के लिए कुछ डराने की कोशिश कर रहा था कि चले जाओ मुझे नहीं जाना है तुम्हारे साथ मुझे यही रहना है।
वो काले बादल जो इंसान के आकार से भी ज्यादा बड़े और गुस्से में जैसे उसे कह रहे हो कि तुम्हारा समय हो गया है।
अब तुम इस दुनिया के लोगो को और ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा सकते हो।
अब तुम्हारा इस दुनिया में रहना इंसानों के लिए खतरा बन सकता है।
तुमने बहुत ज्यादा लोगो को नुकसान पहुंचाया है।
और तुम अपने शक्तियों का ग़लत प्रयोग कर रहे हो।जो हमारे नियमों के खिलाफ है।
उस लड़के को ये सब आवाजे साफ साफ सुनाई पड़ रही थी
हा ये एक अलग बात है कि उसके समझ से ये सब बाहर था कि ये सब हो क्या रहा है।अब उसके पैर धीरे धीरे पीछे कि तरफ चलना शुरू हो रहे थे उस भले ये सब समझ में ना आ रहा हो लेकिन उसे ये अहसास हो गया था कि ये देखने के लिए वो घर से नहीं निकला था जो उसके आंखों के सामने चल रहा है।उसके घर जाने की इच्छा अब उसके विश्वास में बादल रही थी।
और अब वो वहा नहीं रुकना चाह रहा था।लेकिन अब शायद बहुत देर हो चुकी थी। उसके इस फैसले में…………………
कहानी आगे जारी रहेगी………..
सन् 1929 के दिसंबर में लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुआ जिसमें प्रस्ताव पारित कर इस बात की घोषणा की गई कि यदि अंग्रेज सरकार 26 जनवरी 1930 तक भारत को स्वायत्तयोपनिवेश (डोमीनियन) का पद नहीं प्रदान करेगी, जिसके तहत भारत ब्रिटिश साम्राज्य में ही स्वशासित एकाई बन जाने उस दिन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा की और अपना सक्रिय आंदोलन आरंभ किया। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। इसके पश्चात स्वतंत्रता प्राप्ति के वास्तविक दिन 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। भारत के आज़ाद हो जाने के बाद संविधान सभा की घोषणा हुई और इसने अपना कार्य 9 दिसम्बर 1947 से आरम्भ कर दिया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। डॉ० भीमराव आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। संविधान निर्माण में कुल 22 समितीयां थी जिसमें प्रारूप समिति (ड्राफ्टींग कमेटी) सबसे प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण समिति थी और इस समिति का कार्य संपूर्ण ‘संविधान लिखना’ या ‘निर्माण करना’ था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष विधिवेत्ता डॉ० भीमराव आंबेडकर थे। प्रारूप समिति ने और उसमें विशेष रूप से डॉ. आंबेडकर जी ने 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन में भारतीय संविधान का निर्माण किया और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को 26 नवम्बर 1949 को भारत का संविधान सुपूर्द किया, इसलिए 26 नवम्बर दिवस को भारत में संविधान दिवस के रूप में प्रति वर्ष मनाया जाता है। संविधान सभा ने संविधान निर्माण के समय कुल 114 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी। अनेक सुधारों और बदलावों के बाद सभा के 308 सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को संविधान की दो हस्तलिखित कॉपियों पर हस्ताक्षर किये। इसके दो दिन बाद संविधान 26 जनवरी को यह देश भर में लागू हो गया। 26 जनवरी का महत्व बनाए रखने के लिए इसी दिन संविधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यूएंट असेंबली) द्वारा स्वीकृत संविधान में भारत के गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई।
गणतन्त्र दिवस भारत का एक राष्ट्रीय पर्व है जो प्रति वर्ष 26 जनवरी को मनाया जाता है। इसी दिन सन् 1950 को भारत सरकार अधिनियम (एक्ट) (1935) को हटाकर भारत का संविधान लागू किया गया था। एक स्वतंत्र गणराज्य बनने और देश में कानून का राज स्थापित करने के लिए संविधान को 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को इसे एक लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली के साथ लागू किया गया था। 26 जनवरी को इसलिए चुना गया था क्योंकि 1930 में इसी दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई० एन० सी०) ने भारत को पूर्ण स्वराज घोषित किया था। यह भारत के तीन राष्ट्रीय अवकाशों में से एक है, अन्य दो स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती हैं।
26 जनवरी को गणतंत्र दिवस समारोह पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा भारतीय राष्ट्र ध्वज को फहराया जाता हैं और इसके बाद सामूहिक रूप में खड़े होकर राष्ट्रगान गाया जाता है। फिर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को सलामी दिया जाता है । गणतंत्र दिवस को पूरे देश में विशेष रूप से भारत की राजधानी दिल्ली में बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस अवसर के महत्व को चिह्नित करने के लिए हर साल एक भव्य परेड इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन (राष्ट्रपति के निवास) तक राजपथ पर राजधानी, नई दिल्ली में आयोजित किया जाता है। इस भव्य परेड में भारतीय सेना के विभिन्न रेजिमेंट, वायुसेना, नौसेना आदि सभी भाग लेते हैं। इस समारोह में भाग लेने के लिए देश के सभी हिस्सों से राष्ट्रीय कडेट कोर व विभिन्न विद्यालयों से बच्चे आते हैं, समारोह में भाग लेना एक सम्मान की बात होती है। परेड प्रारंभ करते हुए प्रधानमंत्री अमर जवान ज्योति (सैनिकों के लिए एक स्मारक) जो राजपथ के एक छोर पर इंडिया गेट पर स्थित है पर पुष्प माला डालते हैं| इसके बाद शहीद सैनिकों की स्मृति में दो मिनट मौन रखा जाता है। यह देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए लड़े युद्ध व स्वतंत्रता आंदोलन में देश के लिए बलिदान देने वाले शहीदों के बलिदान का एक स्मारक है। इसके बाद प्रधानमंत्री, अन्य व्यक्तियों के साथ राजपथ पर स्थित मंच तक आते हैं, राष्ट्रपति बाद में अवसर के मुख्य अतिथि के साथ आते हैं।
परेड में विभिन्न राज्यों की प्रदर्शनी भी होती हैं, प्रदर्शनी में हर राज्य के लोगों की विशेषता, उनके लोक गीत व कला का दृश्यचित्र प्रस्तुत किया जाता है। हर प्रदर्शिनी भारत की विविधता व सांस्कृतिक समृद्धि प्रदर्शित करती है। परेड और जुलूस राष्ट्रीय टेलीविजन पर प्रसारित होता है और देश के हर कोने में करोड़ों दर्शकों के द्वारा देखा जाता है। 2014 में, भारत के 64वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर, महाराष्ट्र सरकार के प्रोटोकॉल विभाग ने पहली बार मुंबई के मरीन ड्राईव पर परेड आयोजित की, जैसी हर वर्ष नई दिल्ली में राजपथ में होती है।[1]
गणतन्त्र (गण+तंत्र) का अर्थ है, जनता के द्वारा जनता के लिये शासन। इस व्यवस्था को हम सभी गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं। वैसे तो भारत में सभी पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं, परन्तु गणतंत्र दिवस को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाते हैं। इस पर्व का महत्व इसलिये भी बढ जाता है क्योंकि इसे सभी जाति एवं वर्ग के लोग एक साथ मिलकर मनाते हैं।
गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी को ही क्यों मनाते हैं? मित्रों, जब अंग्रेज सरकार की मंशा भारत को एक स्वतंत्र उपनिवेश बनाने की नजर नही आ रही थी, तभी 26 जनवरी 1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरु जी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पूर्णस्वराज्य की शपथ ली। पूर्ण स्वराज के अभियान को पूरा करने के लिये सभी आंदोलन तेज कर दिये गये थे। सभी देशभकतों ने अपने-अपने तरीके से आजादी के लिये कमर कस ली थी। एकता में बल है, की भावना को चरितार्थ करती विचारधारा में अंग्रेजों को पिछे हटना पङा। अंतोगत्वा 1947 को भारत आजाद हुआ, तभी यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1929 की निर्णनायक तिथी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनायेंगे।
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26 जनवरी, 1950 भारतीय इतिहास में इसलिये भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि भारत का संविधान, इसी दिन अस्तित्व मे आया और भारत वास्तव में एक संप्रभु देश बना। भारत का संविधान लिखित एवं सबसे बङा संविधान है। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में 2 वर्ष, 11 महिना, 18 दिन लगे थे। भारतीय संविधान के वास्तुकार, भारत रत्न से अलंकृत डॉ.भीमराव अम्बेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने विश्व के अनेक संविधानों के अच्छे लक्षणों को अपने संविधान में आत्मसात करने का प्रयास किया है। इस दिन भारत एक सम्पूर्ण गणतान्त्रिक देश बन गया।देश को गौरवशाली गणतन्त्र राष्ट्र बनाने में जिन देशभक्तो ने अपना बलिदान दिया उन्हे याद करके, भावांजली देने का पर्व है, 26 जनवरी।
मित्रो, भारत से व्यपार का इरादा लेकर अंग्रेज भारत आये थे, लेकिन धीरे -धीरे उन्होने यहाँ के राजाओं और सामंतो पर अपनी कूटनीति चालों से अधिकार कर लिया। आजादी कि पहली आग मंगल पांडे ने 1857 में कोलकता के पास बैरकपुर में जलाई थी, किन्तु कुछ संचार संसाधनो की कमी से ये आग ज्वाला न बन सकी परन्तु, इस आग की चिंगारी कभी बुझी न थी। लक्ष्मीबाई से इंदिरागाँधी तक, मंगल पांडे से सुभाष तक, नाना साहेब से सरदार पटेल तक, लाल(लाला लाजपत राय), बाल(बाल गंगाधर तिलक), पाल(विपिन्द्र चन्द्र पाल) हों या गोपाल, गाँधी, नेहरु सभी के ह्रदय में धधक रही थी।
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